ओ लाली मेरी            प्यारी दुलारी

        कहकर जसोदा सजाये,

चमकीले लट               काले घन-घट,

        संवारकर वेणी बनाये ।

 

कितने दिनों की आस             आज बुझाये मैया प्यास

               हाथों से राधा को सजाये,

पहिनाये नवीन वसन            और कीमती भुषण,

               प्यारी को पुचकारती जाये ।

 

ऐसो मांग का सिन्दूर             कि उदित सूरज के गुरूर        

तोड़कर करे चूर चूर ।           

तिलक पे अलक[1]                  ललाट पे झलक

               पलक में ध्यान करे दूर[2]

 

जोगी-मुनि-जन                   के मोहित करे मन

               जब लट बलखाये,

तपस्वियों की क्या बात          कामदेव को दे मात

               उनके नख की छटाएँ ।  

 

नयन युगल         में सजाया काजल,

               पोंछा सुन्दर मुख,

भौंहों की रंगीली          भंगिम छबीली,

               मन्मथ को दें दुख ।

 

नासा के उपर              सुन्दर बेसर

               साँसों के संग डोले,

पुरुष-रतन                  को कर दे ख़तम

               उन की जान से खेले ।

 

कान के कान-फूल         हैं अमोल-अतुल

               जिसकी छटा रवि को घटाये,

दीवाना परवाना          हुआ अनंग मस्ताना[3]

               चरणों में लोट्पोट खाये ।

 

चन्दन-चर्चित              परम पुनीत

               पीन-पयोधर[4] जोड़

कञ्चुकी कसकर           उनको ढंक कर

               खींच दिया डोर ।

 

प्रवाल प्रबल[5]              आलोकित झलमल[6]

               बीच में काली मोती,

हेम हीरे मणि              इसपे है बूनी

               कञ्चुकी बिखेरे ज्योति ।

 

माँ यशोमती                              है प्यार की मूर्ति

               राई को लिया गोद में,

ये सब भुषण                              करके जतन

               पहिनाया उनके गले में ।

 

हृदय पे हीर-हार                 लागे अति मनोहर

               उसपे पदक[7] का साज,

देख कर दिनकर[8]          किरणों को समेटकर

               घर लौटे वह निलाज[9]

 

राम[10] काम शाला[11]             शंख शशिकला[12]

               शोभे बाहों पर ।

रतन कंगन                         बजे कनकन झनकन

               देखे काम चमककर ।

 

गाढ़े तार का साज                जैसे गति कामराज

               बाहों में पहिनाये,

उंगलियों पर अंगूठी              हैं ऐसी अनूठी

               काम का गुरूर कुचलाये ।

 

मेघ के गर्व                         को करे खर्व

सुन्दर नीला वास,

किंकिणी की आवाज़             जैसे मधुर साज़

बोले नट्खट भाष ।

 

मंजीर पैंजन                करके जतन

               पग में पहिनाये शेखर,

जसोदा-रोहिनी                   उल्लसित अपनी

               धनी को हसीन सजाकर  ।




[1] ज़ुल्फ

[2] राधाजी के ललाट पे जो तिलक या बिन्दी है, उसपे ज़ुल्फ गिर रहा है, इससे उनकी खूबसूरती और बढ़ रही है ; इसे कोई योगीन्द्र भी देखे, तो पलक झपकते ही उसका ध्यान टूट जायेगा ।

[3] अनंग अर्थात कामदेव (यहाँ पर श्यामसुन्दर) जिनका अन्दाज़ मस्ताना है, राधाजी के दीवाने हो जाते हैं ।

[4] स्तन

[5] गहरे लाल रंग के प्रवाल

[6] यह कञ्चुकी वर्णना है ।

[7] लॉकेट

[8] सूरज

[9] बेशर्म  की तरह लौट आया ।

[10] रामिणी ; रमण करनेवाली ;  यहाँ पर  राधाजी ।

[11] काम-कला का आलय

[12] बाहों पर अलंकार पहनी हुयीं हैं; यह अलंकार चन्द्रकला के आकार के शंखों से बना हुआ है ।

 

 

आवत रे मधुमंगल की टोली,

देख सखागण बजाये ताली ।

 

चलते ही चरण पड़े तीन बंक[1],

पग कलंकित कालिन्दी-पंक[2]

 

बोलते ही मुख पर करे कितने भंग[3],

नाचे ज़ोर से और बजावत अंग ।

 

भोजन-सर्वस्व, नहीं प्रतिबन्ध[4],

हर रोज़ सुबह लगाये द्वन्द्व[5]

 

मिष्ठान पक्वान लोभी बावला-चित्त,

इनके लिये गिरवी रखे यज्ञोपवीत[6]

 

कभी न देखा ऐसा छलिया,

प्यार से देवे दस गालियां ।

 

गोविन्द दास करे गुन-गान,

द्विज-पग पे लाख प्रणाम[7]


[1] मधुमंगल आगे बढ़ने के लिये हमेशा तीन पग लेता है, और वे तीन पग बंक अर्थात टेढ़े होते हैं ।

[2] मधुमंगल के पैर कालिन्दी के पंक अर्थात मिट्टी से मैले (कलंकित) होते हैं ।

[3] भंगिमा

[4] मधुमंगल के लिये भोजन ही सब कुछ है; उसके मुताबिक खाने पीने के मामले में कोई नियम लागू नहीं हो्ना चाहिये ।

[5] हर सुबह भोजन करते वक़्त वह दोस्तों को चुनौती देता है – कि कौन कितना ज़्यादा भोजन कर सकता है ।

[6] मधुमंगल मीठा और पक्वान्न के लिये अपने यज्ञोपवीत, जो एक ब्राह्मण के लिये अत्यज्य है, उसे भी गिरवी रख सकता है ।

[7] सन्त कवि गोविन्द दास श्यामसुन्दर से ऐसे निष्कपट प्रेम करने वाले ब्राह्मण को लाखों बार प्रणाम करते हैं ।

 

राग बिलोवार

 

कुवलय[1]-नील-रत्न[2]-दलितांजन[3]

मेघ-पुंज जैसे वर्ण सुछन्दा,

कुंचित केश पे सजे मोर-पंख

अलका-वलित[4] ललितानन[5] चन्दा ।

 

आवत रे श्याम नव-नागर

भाविनी-भाव-विभावित-अन्तर[6]

दिन-रात नहीं जाने और ।

 

मधुर-अधर में हास अति मनोहर,

उसपर सुमधुर मुरली विराज ।

भौं-विभंगिम[7] कुटील निरीक्षण,

कुलवती दीवानी[8], दूर भये लाज ।

 

गजपति-भांति गमन अति मन्थर[9],

मणी-मंजीर बजे रुनझुनिया,

देख कर सैकड़ों मन्मथ मूर्छाये,

गोविन्द दास कहे धन्य धनिया[10]




[1] नील कमल

[2] नीलमणि

[3] दलित कज्जल, जो एक उज्ज्वल रसायन है । यह पारा और पारद से बनता है ।

[4] चूर्ण कुन्तल से घेरे हुए

[5] कलात्मक चेहरा

[6] श्याम का अन्तर (दिल) भाविनी (किशोरी जु) के प्रेम-भाव से विभावित (चिन्तनशील) है ।

[7] श्यामसुन्दर बड़ी कुशलता से भौंहों नचा रहे हैं, और वक्र निगाहों से निरीक्षण कर रहे हैं।

[8] अच्छे कुल (परिवार) की नारी भी दीवानी हो गईं और उनकी लज्जा दूर हो गई ।

[9] श्यामसुन्दर की गति का वर्णण

[10] धनिया का दो अर्थ हो सकता है – १) धन्य २) धनी, अर्थात श्यामसुन्दर ।

राग मायुर

 

कमल-कुसुम सुकोमल कान्ति,

सर पे मोर-पंख की पंक्ति ।

 

आकूल अलि[1]-कुल बकुल की माला,

चन्दन चांद-चर्चित भाला[2]

 

मदन मोहन मूर्ति कान्ह[3],

देख उन्माद हुये युवती-प्राण ।

 

भौं-विभंगिम[4] दे हिचकोले,

उन्नत नासा पे मुक्ता डोले ।

 

बंकिम ग्रीवा, मीठा बोले,

कंचन-कुंडल गाल पे डोले ।

 

मणिमय आभूषण अंग पे विराजे,

पीत निचोल[5] उस पर सजे ।

 

अरुण-चरण पे मणि-मंजीर सोहे,

गोविन्द दास को और[6] न भाये ।

 


[1]भ्रमर ; भ्रमर आकुल होकर बकुल की माला पर मंडरा रहे हैं ।

[2]भाल

[3]कान्हा

[4]भौंहों को अच्छी तरह से नचाना – उन्हें देखकर गोपियों कें दिल हिचकोले खाते हैं ।

[5]धोती

[6]कोई और

राग सिन्धुड़ा

 

अंजन-गंजन[1]       जग-जन-रंजन[2]

जलद-पुंज जैसे वर्ण,

तरुण-अरुण-स्थल-       कमल-दल-अरुण[3]

मंजीर-रंजित-चरण ।

 

देखो सखी नागर-राज करे विराज,

सुधा-रस टपके,      हास विकसित,

रूप ऐसा कि चांद को आये लाज ।

 

इन्दीवर-वर-        गर्व-विमोचन[4],

लोचन मन्मथ-फन्दा,

भौं-भुजग-पाश[5] से        बंध लिया कुलवती,

मनमोहन चेहरा-चन्दा ।

 

भ्रमर भटके        जानू तक लटके,

केलि-कदम्ब की माला[6],

गोविन्द-दास-चित्त       विहारे नित नित,

ऐसी मूर्ति रसाला ।

 




[1] यहां पर अंजन का अर्थ काजल नहीं है, बल्कि अंजन एक उज्वल रसायन है; श्यामसुन्दर का वर्ण अंजन से भी उजला है ।

[2] वे त्रिजगत के लोगों को आनन्द प्रदान करते हैं ।

[3] तरुण अर्थात ताज़े गुलाबी स्थलकमल के समान गुलाबी चरण जो मंजीर (नुपूर) से शोभित हैं ।

[4] इन्दीवर-वर (श्रेष्ठ नील कमल) का गर्व अच्छे से तोड़े ऐसे नयन, जो कामदेव के फन्दा है ।

[5] उनके भौंहें, भुजग (सांप) जैसे हैं, और वे इनको रज्जु की तरह इस्तेमाल करके कुलवती रमणियों को फांसते हैं ।

[6] कदम्ब की माला, केलि, अर्थात रति-रस के लिये आतुर करती है । उसके इर्द गिर्द भ्रमर घूमते हैं, और वह जानू तक लटकती है ।

 

 

 

My dearest sisters and brothers,  it fills me with utmost pain to see that Bharatvarsha has today hit rock bottom with the December 16 incident. Why is it so sad? Don’t such incients occur in other parts of the world ? More gruesome, that too where children are the victims ? Yet, this is the saddest. Do you know why ? Because, as my western friend explained – we consider India the cradle of spiritualism, the “Mother” land, the Holiest of Holy Places. How sad ! Why have we denigrated to this low level today ? It is due to the fact that we have forgotten the Vedas, the sayings of the ancient sages – the sages whose DNA all of us carry – all Indians, to whichever religion we may belong today. None of us can deny that we are the proud inheritors of the most ancient, purest, loftiest, deepest wisdom – the Vedas.

We think that Sanatan Dharma – the Eternal Religion of humankind – confers a lower status on women. And it is this thinking that makes men justify their disrespect for women. Women also think that when the Dharma itself is conferring such low treatment to them, then they should also bear everything silently. In fact, we wrongly think that the ability to bear torture and insult proves that we are the great “Indian women”. However, my dear friends, it is not so. The Vedas, that are the chief source and foundation of Sanatan Dharma, accord the highest importance to women. Please hear the Vedas talking !

1. Girls should train themselves to become complete scholars and youthful through Brahmcharya and then enter married life.

Atharva 11.5.18

This means that education is compulsory for women to the extent that they should become “scholars”. And they should acquire this before entering marriage. This also indicates that the Vedas want that we should have educated wives and mothers.

2. Atharva 14.1.6

Parents should gift their daughter intellectuality and power of knowledge when she leaves for husband’s home. They should give her a dowry of knowledge.

Please note – “dowry of knowledge”.

 

3. Atharva 14.1.20 – Oh wife! Give us discourse of knowledge!

It means that it is worthy of a man to seek knowledge from his wife.

 

4. Atharva 7.46.3

O woman ! You are the protector of children, you have definite knowledge, you are worth thousands of prayers and impress all directions, O woman, you accept prosperity. O wife of deserving husband, teach your husband to enhance wealth.

 

5.Atharva 7.47.1

Oh woman! You are the keeper of knowledge of all types of actions (karma).

 

6. Atharva 7.47.2

Oh woman! You know everything. Please provide us strength of prosperity and wealth.

This indicates that woman is the first teacher for a child. All family is dependent on her. He family members acknowledge this and consider her as the strength-giver.

 

7. Atharva 7.48.2

Oh woman! Please provide us with wealth through your intellect.

 

This means that woman is naturally intelligent. In Bhagavad Geeta also,  our Beloved Lord Krishna has stated that buddhi or intelligence is a feminine quality and He Himself is intelligence.   But what sort of intelligence – bad or good ? Atharva Ved answers.

 

8. Atharva 14.1.64

Oh woman! Utilize your Vedic intellect in all directions of our home!

This means that it is necessary for women to have Vedic intellect, the intelligence to steer the family and society on the path of Dharma, righteousness, not use her intelligence for the down fall of the society and her own.

 

9. Atharva 2:36:5

Oh bride! Step into the boat of prosperity and take your husband beyond the ocean of worldy troubles into realms of success.

This signifies that man should consider woman not only as the captain in spiritual life, abut also in material progress. She should be made capable of attain the  highest spiritual and material prosperity.

 

Woman alone can grant her husband  total security. The entire family looks up at her. See this verse –

10. Atharva 1.14.3

Oh groom! This bride will protect your entire family

 

11. Atharva 2.36.3

May this bride become the queen of the house of her husband and enlighten all.

12. Atharva 11.1.17

These women are pure, sacred and yajniya (as respected as yajna); they provide us with subjects, animals and food. This indicates that when the society worships woman, they gain wealth, animals that help in enhancing the economy and food is never scarce.

 

13. Atharva 12.1.25

Oh motherland! Give us that aura which is present in girls !

This signifies that girls have a certain aura of purity, divinity, holiness – and men are praying that they too should become holy and pure like them, so that they also gain such aura.

14. Atharva 12.2.31

Ensure that these women never weep out of sorrow. Keep them free from all diseases and give them ornaments and jewels to wear.

 

15. Atharva 14.1.20

Dear wife! Become the queen and manager of everyone in the family of your husband.

16. Atharva 14.1.50

Dear wife! I am holding your hand for prosperity.

17. Atharva 14.1.61

Dear bride! You shall bring bliss to all and direct our homes towards our purpose of living.

18. Atharva 14.2.71

Dear wife! I am knowledgeable and you are also knowledgeable. If I am Samved then you are Rigved.

19. Atharva 14.2.74

This bride is illuminating. She has conquered everyone’s hearts!

20. Atharva 7.38.4 and 12.3.52

Women should take part in the legislative chambers and put their views on forefront.

 

Now let us see what Rig Ved, the oldest Ved has to say.

  1. Rig 10.85.7
    Parents should gift their daughter intellectuality and power of knowledge when she leaves for husband’s home. They should give her a dowry of knowledge.
  2. It is so sad that even today there are states that do not give a share of the father’s property to the married daughter. Yet, see that Rig Ved protects our right to parental property.

Rig 3.31.1
The right is equal in the fathers property for both son and daughter.

  1. 3. Rig 10.159
    A women speaks after waking up in morning, “My destiny is as glorious as the rising sun. I am the flag of my home and society. I am also their head. I can give impressive discourses. My sons conquer enemies. My daughter illuminates the whole world. I myself am winner of enemies. My husband has infinite glory. I have made those sacrifices which make a king successful. I have also been successful. I have destroyed my enemies.”
    4. Rig ved 1.164.41
    One ved, two ved, or four ved along with ayurved, dhanurved, gandharved, aarthved etc in addition with education, kalp, grammar, nirukt, astrology, meters i.e the six vedaang should be attained by the clear-minded woman, which is equivalent to the crystal-clear water and spread this diversified knowledge among the people.
    5. Rig ved 10.85.46
    Like wise in so many other mantras a woman has been presented to play an essential role in family and as wife. Similarly she has been given the lead stage in society works, in governmental organizations, and for ruling the nation is also mentioned in Vedas.

Pandit Sripad Satvalekar’s “Simple Translation of Rigveda (Rigved ka subodh bhashya)” gives the following statements :

  1. Women have to be courageous.  Pgs 122, 128.
  2. Women have to be expert in various work.Pg 122.
  3. Women should gain name and fame. Pg 123.
  4. Women should learn to ride and drive vehicles. Pg. 123
  5.  Women must acquire talents. Pg. 123.
  6. Women should acquire wealth and think about development. Pg.125.
  7. Women should be intelligent and scholarly. Pg.126.
  8. Women should protect the society and the world by entering the Armed Forces. Pg.134. 136.
  9. Women ahould become enlightened. Pg. 137.

10. Women should bring about economical prosperity, enhancement in food and development. Pgs. 141, 146.

 
Now let us come to Yajur Ved.

  1. Yajur 20.9
    “There are equal rights for men and women to get appointed as ruler.”

The ones who say that women are not capable of administration are actually fooling us. The Vedas do not say this at all. In fact it says just the opposite. If a woman has the necessary educational and leadership qualities, which the Vedas DO allow her to acquire, she can surely become a ruler. For eg. Indira Gandhi, the Prime Minister of India defeated Pakistan badly in the 1971 war. Her contribution to the Freedom Struggle on Bangladesh was extraordinary. Golda Meir of Osrael defeated Egyt, Syria and Jordan within 6 days of a war. In 1982, UK defeated Argentina in the Battle of Falkland Islands  under the leadership of Margaret Thacher. In fact Yajur Ved even goes on to state that –

  1. Yajur 16.44 – “There should me a women army. Let the women be encouraged to participate in war.”
  2. Yajur ved 10.26 – In this mantra it is enforced that the wife of ruler should give education of politics to the others. Likewise the king do justice for the people, the queen should also justify her role.

 

 The Vedas are very clear that woman is the foundation of the human society. The Vedas state that if you want to destroy a nation and her culture, then do not allow her women to gain education. Destroy her self-dignity  and then see her bring up her children with demonic qualities. After this no one can stop the destruction and down fall of that society / nation. ( Exactly what the Muslim Taliban  have done to Afghanistan and Pakistan, and wish to do to India also. By not respecting our women, we are helping them only.)  

 

After 1000 years of slavery, wee have forgotten the Vedas and their real message. We are now using woman as a commodity. No advertisement is possible without “using” a woman. We merely want to objectify her body. Woman too has given in to the market-policy and is using her body for material gain. Our society today is plagued with pre-marital and extra-marital physical relations. We are so foolish ! We are ignoring the Vedas, the foundation of man’s natural tendency, or Dharma. We are stopping women from gaining the knowledge of shastras ! How much more self-destructive can we get ?

 

Nowhere in the Vedas it is written that women cannot conduct poojas and yagnas. Here, we must also note that yajna does not mean fire-sacrifice alone, but any good holy sacred project.

Rigveda 1.146.3: The Yajamaan (performer of Yajna) and his wife are two cows and the fire of Yajna is the calf.
Rigveda 1.72.5: Scholars perform Yajna with their wives and achieve bliss.
Rigveda 2.6.5: If mother and sister perform Yajna together, that brings bliss.
Rigveda 7.1.6: The young woman approaches the fire with Havi.
Atharvaveda 3.28.6: O wife, you have entered the world of Yajna.
Atharvaveda 3.30.6: All the members of family should perform Yajna.
Atharvaveda 14.2.18: O woman, you should perform Yajna in Grihastha Ashram.
Atharvaveda 14.2.25: O woman, perform Yajna with bliss.

My dear friends, please see what the Vedas say about Womens’ Education :

  1. Rigveda 6.44.18: The government should ensure that all boys and girls get good education, follow Brahmacharya and strengthen the society.

 

  1. Yajurveda 10.7: Government should put special efforts to make all women into scholars.

 

  1. Rigveda 3.1.23: Smart people should ensure that all boys and girls become scholars.

 

  1. Rigveda 2.41.16: All girls should receive education from scholarly women.

 

  1. Yajurveda 11.36: Parents should ensure good education of children – boys and girls – and then send them to scholars for a long period so that their enlighten the families and nation like sun.

 

  1. Rigveda 1.152.6: The way mother nourishes her children with milk, scholars should nourish girls and boys with knowledge.

 

  1. Yajurveda 6.14: Teachers should ensure that they inculcate noble qualities in their students (girls and boys) through dissemination of knowledge of Vedas.

 

  1. Rigveda 2.41.17: All scholars should instruct their scholarly wives to educate all girls.

 

  1. Yajurveda 34.40: The way dawn brings happiness among human beings, scholarly woman should bring happiness by educating girls.

 

10.Yajurveda 20.85: Scholarly woman should ensure that she educates other women and makes them also scholars.

 

11. Rigveda 1.117.24: Teachers should ensure that they train boys and girls with highest levels of noble values and educate them and then return them to their respective parents.

 

12.Rigveda 1.164.41: The woman who masters and teaches all the Vedas brings bliss in entire society.

 

13.Rigveda 7.40.7: Scholarly woman that possess noble qualities should educate all women and bring happiness everywhere.

 

We must remember that an educated and learned woman can change the course of history, like Madame Marie Curie, who discovered Radium. Just listen to what the Vedas  have to say –

  1. Yajurveda 20.84: The scholarly woman purifies our lives with her intellect. Through her actions, she purifies our actions. Through her knowledge and action, she promotes virtue and efficient management of society.
  2. Yajurveda 20.85: Scholarly woman inspires us towards knowledge. She promotes conduct of noble acts in society.
  3. Yajurveda 20.86: Scholarly woman rushes an exhilaration within us that comes only through knowledge. She enlightens our knowledge, applications and actions.
  4. Rigveda 1.164.49: O scholarly woman, your knowledge provides us peace and bliss. You lead us to inculcate noble virtues. You provide us prosperity through your knowledge. May we obey your inspiration that you provide as a mother. A scholarly woman is mother of entire society.
  5. Rigveda 2.41.16: O provider of great knowledge, O my mother through the nourishment of knowledge that you have provided, our life is scattered without you. Please provide us direction.
  6. Rigveda 2.41.17: A scholarly woman, the entire life of society depends upon you. You provide us the right knowledge. May you bring knowledge to all segments of society.
  7. Rigveda 6.49.7: O scholarly woman, you purify our character. You have noble characteristics. You conduct noble actions. You have noble habits. We bow to your greatness that provides bliss to all.
  8. Rigveda 6.61.2: O scholarly woman, the way a river breaks away mightiest of hills and rocks, the scholarly woman destroys myths and hypes through her intellect alone. May we bow to women through our polite words and noble actions.
  9. Rigveda 6.61.3: O scholarly woman, destroy the evil inside us through your knowledge and character. Gift us with knowledge of Vedas. O performer of noble actions, you provide us stream of knowledge in same manner as a river provides stream of water.

10.Rigveda 7.96.3: O scholarly noble woman brings only happiness in society. She makes us knowledgeable and alert. She guides us like the mantras in Yajna and teaches us use of everything in world.

11.Rigveda 10.17.7: Those who desire the society to become noble and powerful, they respect woman and please her. Those who desire virtues respect woman and please her. Those who respect woman obtain bliss, knowledge and happiness.

12.Atharvaveda 7.57.1: Whenever I am hurt by meanness of world or misunderstanding with others, a scholarly woman heals my wounds. (Because women possess the soft skills and emotional intelligence that is not naturally and easily available to men.)

My heartfelt prayer to my Beloved Lord God is – may woman gain the position that she is worthy of, the position that You have already conferred upon her, may all men respect her, and above all, may she herself respect her body, mind and soul  to bring about material and spiritual progress to humankind.

 

 

 

३५

जन्म से मैंने,       गौर-गर्व में बिताया,

फिर कैसे जिऊं इतना दुख सहकर ?

उर बिना सेज का,       स्पर्श ना जानूं[1],

सो तन अब लोटे ज़मीन पर ।

 

वदन-मण्डल,       चांद झिलमिल,

सो अति सुन्दर चेहरा,

लगता है ऐसे,      राहू के डर से,

चांद है भूमि पे गिरा ।

 

पद-उंगली से ,      ज़मीन पर लिखूं,

हो गई मैं पागल,

श्रावन की वर्षा जैसे,      निर्झर झरे,

दिल हुआ विकल[2]

 

कभी तो मुख से,        फेन निकले,

घन घन बहे निःश्वास,

गौर हरि से मैं,     पुनः मिलाऊंगा,

निश्चय किया माधव दास[3]




[1]हमारे प्रभु सारी रात प्रिया जी को अपने उर, अर्थात वक्ष पर सुलाते थे, और प्रियाजी के अंग को पलंग से स्पर्श ही नहीं होने देते ।

[2]व्याकुल

[3]सन्त माधवदास ने निश्चय किया कि वे प्रियाजी को गौर हरि से ज़रूर मिलायेंगे ।

३४

(प्रियाजी कहती हैं)

गौर-गर्व[1] में हाय,        जीवन बिताया,

अब वे हुये निर्मम[2],

अपनों के वचन,     गरल सम लागे,

गृह हुआ अग्नि सम[3]

 

याद कर उनका मुख,     दिल फटा जाये,

शूल चूभे वक्ष में,

गौरांग बिना,       दिवस ने बीते,

नींद न आये रात में ।

 

चैन न पाऊं,        ज़मीन पर लोटूं,

पवन-अनल[4] जलाये अंग,

सखि ! क्या करूं,        किससे भेजूं सम्वाद,

क्या, मिलेगा उनका संग ?

 

व्यथित जन[5],       समझाये अनुक्षण,

“धीरज धरो दिल में,”

सतत यही गुण[6],        करूं अवलम्बन,

वज्र गिरे माधव के सर पे[7]




[1] गौरांग मेरे हैं, इस गर्व में जीवन बिताया ।

[2] निष्ठुर

[3] अपनों के मीठे बोल, अर्थात गौर-विषयी प्रसंग या तो उनके द्वारा की गयी कोई बात, जो गौर की याद दिलाये, विष जैसे प्रानघाती लग रहे हैं । गृह भी अग्नि समान लग रहा है, क्युं कि वहां भी सर्वत्र गौर की यादें हैं ।

[4] शीतल पवन और ज़्यादा रति उद्रेक करता है ।

[5] सभी नबद्वीपवासी गौर विरह में व्यथित हैं, और प्रियाजी को समझाने का प्रयास कर रहे हैं ।

[6] यही गुण = प्रियाजी कह रही हैं कि वे धीरज / संयम सतत ही रखने की कोशिश कर रही हैं ।

[7] सन्त कवि माधव दास प्रार्थना करते हैं कि प्रियाजी की ऐसी हालत देखने से तो अच्छा है कि वज्र के आघात से मर जायें ।

३३

ठाकुर लोचन दास ने “श्री चैतन्य मंगल” में श्री गौर-गोविन्द की नित्य-लीला का सम्भोग लीलारंग इस तरह से वर्णन किया है –

 

शयन मन्दिर में सो रहे हैं नागर,

विष्णूप्रिया गयीं ताम्बूल थाली लेकर ।

 

“आओ आओ” प्रभु ने कहा हंसकर,

बहुत प्यार करे गोद में उठाकर ।

 

विष्णुप्रिया ने प्रभु-अंग पे चन्दन लगाया,

अगुरु कस्तूरी गन्ध से तिलक रचाया ।

 

दिव्य मालती-माला से सजाया गौर-अंग,

श्रीमुख में ताम्बूल दिया करके नाना रंग[1]

 

फिर महाप्रभु, वे तो रसिक-शिरोमणि,

विष्णुप्रिया को सजाये नागर चुड़ामणि ।

 

दीर्घ केश, काम की चंवर जैसे उज्ज्वल,

जूड़ा बांधकर दिया मालती के माल ।

 

चन्द्रकला ने जैसे मेघ को बांध लिया है,

उगल रही या निगल, समझ न सकूं मैं ।

 

सुन्दर ललाट पे रचा सिन्दूर बिन्दु,

दिवाकर की गोद में खेल रही इन्दु ।

 

रचा चन्दन बिन्दु, सिन्दूर के चारों ओर,

सूरज देखने को जैसे चांद आये हैं दौड़कर ।

 

खंजन नयन मे दिया उज्ज्वल अंजन,

भौंहों को बनाया काम का कमान ।

 

अगुरु कस्तूरी किया कुच पर लेपन,

उसपर दिया दिव्य कंचुकी-आवरण ।

 

फिर अंग पे सजाया विविध अलंकार,

ताम्बूल हंसी से नागर खुश हुये अपार ।

 

त्रैलोक्य-मोहिनी रूप निहार रहे वदन,

खुशामदी करके ले अधरों का चुम्बन ।

 

क्षण में भुजलता[2] से किया आलिंगन ऐसे,

गजेन्द्र ने कमलिनी को गोद में उठाया जैसे ।

 

विविध रस बिखेरे विनोद-नागर,

औरों की क्या बात, काम का भी अगोचर[3]

 

सुमेरु की गोद में बिजली का प्रकाश[4],

मदन मोहित देखकर यह रति-विलास ।

 

हृदय पर धरे, न छूने दें शय्या से,

करवट न बदले, दोनों लिपटे एक दूसरे से ।

 

दिल पे दिल, मुख पे मुख, रजनी बिताये,

रस-क्लान्ति में चूर, दोनों सुख-निद्रा जाये ।




[1] हंसी मज़ाक

[2] प्रियाजी ने प्रभु को लता जैसी भुजाओं से आलिंगन किया, तो  प्रभु ने उन्हें उठा लिया । ऐसा लगा मानो कोई शक्तिशाली हाथी ने कमल की कलि को गोद में उठा लिया हो ।

[3] कामदेव भी नहीं जानते हैं, प्रभु ऐसी प्रेम-कला का विस्तार करते हैं ।

 

[4] सुमेरु पर्वत सोने से बना है । हमारे प्रभु भी स्वर्ण वर्ण के हैं । इसलिये जब वे प्रियाजी के साथ केलि कर रहे हों, तब ऐसा लगता है, जैसे सुमेरु पर्वत से बिजली टकड़ा रही हो ।

२०

तथा राग

 

राधारानी को शरमाते देखकर चम्पकलता का दिल भर आया, और वह जमकर उनकी तरफदारी करने लगी । उसने कन्हैयाजु को डांट दिया ।

 

कान्हा, यह तेरी कैसी है रीत ?

तेरी बातों में आकर प्यारी बेच दिया तन,

अब तू कहता है विपरीत !

 

पति से मिलाने का बहाना बनाकर,

बगीचे में प्यारी को लाया,

नलिनी-सुकोमल दुलारी-सुनागरी,

अकेली पाकर सताया !

 

( ललिता से -)

धनी सती-शिरोमणी, नव-कुल-कामिनी,

पर-पति सपने में न जाने,

यह नव-यौवन, अमूल्य रत्न-धन,

दूसरे के हाथ में सौंपा तूने ?[1]

 

( फिर श्यामसुन्दर से – )

 

तेरे रस में रसवती,छोड़ निजपति,

न करे भय गुरुजन से !

चम्पक लता की वाणी इतनी मधुर

बलराम-दिल सींचे अमृत से ।

 




[1]चम्पकलता यह वाक्य ललिता सखी से कह रही है, क्युंकि ललिता सखी ने पहले कहा था कि उसने श्याम को सज्जन जान कर राई का हाथ उसके हाथ में सौंपा था ।

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