निशान्त लीला – १५, १६, १७

१५

राग रामकेलि

सखियों को देख कमल-मुखी,

शरमाकर आधा मुख ढंकई,

अलक्षित[1] कमल-दृग-अंचल[2] से

हरि-मुख-चन्द्र निहारई ।

 

माधवी लता के घर में,

बैठे रसवती और रसराज,

कुसुम-केलि-शय्या[3] पे दोनों विराजे,

चारों तरफ रंगिनी-समाज[4]

 

गोरी के Read more >

निशान्त लीला १२, १३, १४

१२

राग विभाव ललित

ढूंढ़ती हुईं मैया जसोमती,

आयीं कुंज-कुटीर,

दक्ष-विचक्षण[1] ने खबर दी,

चौंक उठे गोकुल-वीर ।

 

हरि ! हरि !

अब भी नींद नहीं खुली !

प्रीतम की गोद को आग़ोश में लेकर

शरम से नयन मूंद Read more >

निशान्त लीला १०

१०

राग ललित

गगन में मगन सगण[1] रजनीकर[2],

चले पश्चिम की ओर,

पद्मिनी-वदन[3] मधुप[4] घन चूमे[5],

त्याग कर कुमुदिनी-क्रोड़ ।

 

जागी रे वृषभानु-कुमारी !

श्याम-गोद में गोरी हुई मगन,

फिर से बोल पड़े Read more >

निशान्त लीला ११

११

तथा राग

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वक़्त जानकर आयीं सखिगण,

दोनों को देख हुयीं आनन्द-मगन ।

 

सखियों की सेवा कहन न जाय,

चांद की मेला[1] वर्णण न जाय ।

 

नीलगिरि को घेरे कनक की माला[2],

गोरी-मुख सुन्दर झलके रसाला Read more >

निशान्त लीला – ९

राग रामकेलि

हिमकर[1] हुआ मलिन[2], नलिन[3] गण हंसे

देख अरुण-किरण[4] विभोर[5],

कोकिल[6] बोले[7], और आकुल भ्रमर-कुल,

त्यजे कुमुदिनी-क्रोड़[8]

 

चौंक कर कहे शुक-शारी की जोड़ी,

“देखो, कैसे सो Read more >

निशान्त लीला – ८

राग कौराग

आहिस्ता छोड़ गोरी उठ बैठी,

नागर-राज भी जागे,

वह सुख पाने, फिर से नागरी,

सो गयी उनकी आग़ोश में ।

 

हरि ! हरि !

अब सुख-यामिनी-शेष,

रति-रस-भोरी[1] गोरी जोड़ी[2] सो गयी,

विगलित वसन और केश Read more >

निशान्त लीला – ७

राग विभाव

वृन्दा की बातों से प्रोत्साहित होकर

शुक-शारी-पपीहा पुनः पुकारे,

सुनकर जागे दोनों, फिर से सो गये

प्रिया को गोदी से न उतारे ।

 

“हरि ! हरि !

जागो नागर कान्हा,

इस पापी विधि ने बड़ा दुख दीन्हा,Read more >

निशान्त लीला ६

राग ललित

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वृन्दा की बातें सुन, सारे पक्षी-कुल

करत कूजन हो कर आकुल ।

 

शारी-शुक और कोयल करे कूजन,

कबूतर पुकारे, भौंरे करें गुंजन ।

 

“मौरि” “मौरि”[1] ध्वनि कर्ण-रसाल,

उस पर वानर का रव – Read more >

निशान्त-लीला ५

निशान्त-काल में जागकर सखियां

ताके वृन्दा-देवी की ओर,

“रति-रस आलस में सोये हैं दोनों,

तुरन्त जगाओ, हो गयी भोर !

 

जाओ, जाओ, करो प्रयास !

राई को जगा कर ले जाओ घर,

अन्यथा होगा सर्वनाश !”

 

शरी-शुक Read more >

निशान्त-लीला ४

राग विभाव

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मिट गया चन्दन, टूट गये आभूषण,

छूट गया कुन्तल[1]-बन्धा,

अम्बर[2]स्खलित, गलित कुसुमावली[3],

धुंधला दोनों मुखचन्दा ।

 

हरि ! हरि ! क्या कहूं ?

अब दोनों किशोरी-किशोर,

दोनों के स्पर्श-रभसRead more >