Gour-virahini Priyaji

३५

जन्म से मैंने,       गौर-गर्व में बिताया,

फिर कैसे जिऊं इतना दुख सहकर ?

उर बिना सेज का,       स्पर्श ना जानूं[1],

सो तन अब लोटे ज़मीन पर ।

 

वदन-मण्डल,       चांद झिलमिल,

सो अति सुन्दर चेहरा,

लगता है ऐसे,      राहू के डर से,

चांद है भूमि पे गिरा ।

 

पद-उंगली से ,      ज़मीन पर लिखूं,

हो गई मैं पागल,

श्रावन की वर्षा जैसे,      निर्झर झरे,

दिल हुआ विकल[2]

 

कभी तो मुख से,        फेन निकले,

घन घन बहे निःश्वास,

गौर हरि से मैं,     पुनः मिलाऊंगा,

निश्चय किया माधव दास[3]




[1]हमारे प्रभु सारी रात प्रिया जी को अपने उर, अर्थात वक्ष पर सुलाते थे, और प्रियाजी के अंग को पलंग से स्पर्श ही नहीं होने देते ।

[2]व्याकुल

[3]सन्त माधवदास ने निश्चय किया कि वे प्रियाजी को गौर हरि से ज़रूर मिलायेंगे ।