Love making of Sri Gouranga and Bishnupriya devi

३३

ठाकुर लोचन दास ने “श्री चैतन्य मंगल” में श्री गौर-गोविन्द की नित्य-लीला का सम्भोग लीलारंग इस तरह से वर्णन किया है –

 

शयन मन्दिर में सो रहे हैं नागर,

विष्णूप्रिया गयीं ताम्बूल थाली लेकर ।

 

“आओ आओ” प्रभु ने कहा हंसकर,

बहुत प्यार करे गोद में उठाकर ।

 

विष्णुप्रिया ने प्रभु-अंग पे चन्दन लगाया,

अगुरु कस्तूरी गन्ध से तिलक रचाया ।

 

दिव्य मालती-माला से सजाया गौर-अंग,

श्रीमुख में ताम्बूल दिया करके नाना रंग[1]

 

फिर महाप्रभु, वे तो रसिक-शिरोमणि,

विष्णुप्रिया को सजाये नागर चुड़ामणि ।

 

दीर्घ केश, काम की चंवर जैसे उज्ज्वल,

जूड़ा बांधकर दिया मालती के माल ।

 

चन्द्रकला ने जैसे मेघ को बांध लिया है,

उगल रही या निगल, समझ न सकूं मैं ।

 

सुन्दर ललाट पे रचा सिन्दूर बिन्दु,

दिवाकर की गोद में खेल रही इन्दु ।

 

रचा चन्दन बिन्दु, सिन्दूर के चारों ओर,

सूरज देखने को जैसे चांद आये हैं दौड़कर ।

 

खंजन नयन मे दिया उज्ज्वल अंजन,

भौंहों को बनाया काम का कमान ।

 

अगुरु कस्तूरी किया कुच पर लेपन,

उसपर दिया दिव्य कंचुकी-आवरण ।

 

फिर अंग पे सजाया विविध अलंकार,

ताम्बूल हंसी से नागर खुश हुये अपार ।

 

त्रैलोक्य-मोहिनी रूप निहार रहे वदन,

खुशामदी करके ले अधरों का चुम्बन ।

 

क्षण में भुजलता[2] से किया आलिंगन ऐसे,

गजेन्द्र ने कमलिनी को गोद में उठाया जैसे ।

 

विविध रस बिखेरे विनोद-नागर,

औरों की क्या बात, काम का भी अगोचर[3]

 

सुमेरु की गोद में बिजली का प्रकाश[4],

मदन मोहित देखकर यह रति-विलास ।

 

हृदय पर धरे, न छूने दें शय्या से,

करवट न बदले, दोनों लिपटे एक दूसरे से ।

 

दिल पे दिल, मुख पे मुख, रजनी बिताये,

रस-क्लान्ति में चूर, दोनों सुख-निद्रा जाये ।




[1] हंसी मज़ाक

[2] प्रियाजी ने प्रभु को लता जैसी भुजाओं से आलिंगन किया, तो  प्रभु ने उन्हें उठा लिया । ऐसा लगा मानो कोई शक्तिशाली हाथी ने कमल की कलि को गोद में उठा लिया हो ।

[3] कामदेव भी नहीं जानते हैं, प्रभु ऐसी प्रेम-कला का विस्तार करते हैं ।

 

[4] सुमेरु पर्वत सोने से बना है । हमारे प्रभु भी स्वर्ण वर्ण के हैं । इसलिये जब वे प्रियाजी के साथ केलि कर रहे हों, तब ऐसा लगता है, जैसे सुमेरु पर्वत से बिजली टकड़ा रही हो ।

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