Sri Krishna’s Beauty

राग सिन्धुड़ा

 

अंजन-गंजन[1]       जग-जन-रंजन[2]

जलद-पुंज जैसे वर्ण,

तरुण-अरुण-स्थल-       कमल-दल-अरुण[3]

मंजीर-रंजित-चरण ।

 

देखो सखी नागर-राज करे विराज,

सुधा-रस टपके,      हास विकसित,

रूप ऐसा कि चांद को आये लाज ।

 

इन्दीवर-वर-        गर्व-विमोचन[4],

लोचन मन्मथ-फन्दा,

भौं-भुजग-पाश[5] से        बंध लिया कुलवती,

मनमोहन चेहरा-चन्दा ।

 

भ्रमर भटके        जानू तक लटके,

केलि-कदम्ब की माला[6],

गोविन्द-दास-चित्त       विहारे नित नित,

ऐसी मूर्ति रसाला ।

 




[1] यहां पर अंजन का अर्थ काजल नहीं है, बल्कि अंजन एक उज्वल रसायन है; श्यामसुन्दर का वर्ण अंजन से भी उजला है ।

[2] वे त्रिजगत के लोगों को आनन्द प्रदान करते हैं ।

[3] तरुण अर्थात ताज़े गुलाबी स्थलकमल के समान गुलाबी चरण जो मंजीर (नुपूर) से शोभित हैं ।

[4] इन्दीवर-वर (श्रेष्ठ नील कमल) का गर्व अच्छे से तोड़े ऐसे नयन, जो कामदेव के फन्दा है ।

[5] उनके भौंहें, भुजग (सांप) जैसे हैं, और वे इनको रज्जु की तरह इस्तेमाल करके कुलवती रमणियों को फांसते हैं ।

[6] कदम्ब की माला, केलि, अर्थात रति-रस के लिये आतुर करती है । उसके इर्द गिर्द भ्रमर घूमते हैं, और वह जानू तक लटकती है ।