Devotees’ Contribution

These are works of devotees wishing to contribute to this blog!

KRSHNA’s SMILE

DKM Kartha

I don’t need precious jewels, I don’t crave colorful clothes
Shower on me just the light of Your enchanting Smile,  Hare!  Krshna!!!
 
I don’t need multi-level houses, I don’t crave jobs that bring celebrity
Shower on me just the kindness of Your Smile,  Hare!  Krshna!!!
 
I don’t need perfect beauty, I don’t crave high status connections
Shower on me just  the beauty of Your Smile, Hare!  Krshna!!!
 
I don’t need positions in big enterprises, I don’t crave golden borders in clothes
Shower on me just the compassion of Your Smile, Hare!  Krshna!!!
 
I don’t need the support of the mighty, I don’t crave fragrant unguents for the body
Shower on me just the tenderness of Your Smile, Hare!  Krshna!!!
 
I don’t need flower petals in my path, I don’t crave golden staircases in my hut
Shower on me just the cooling sweetness of Your Smile, Hare!  Krshna!!!
 
I don’t need beds where desire swells, I don’t crave stages where my fame fattens
Shower on my just the beauty of Your Smile, Hare!  Krshna!!!
 
I don’t need medals, I don’t crave Vaitaalika songs
Just fill my life with Your Smile, Bhagavan, Hare!  Krshna!!!
 
In Malayalam ………..
കൃഷ്ണ സ്മിതം 

 
ഡി. കെ. എം. കർത്താ        

വിലയേറിയ മണിയും വേണ്ടാ,  നിറമേറിയ തുണിയും വേണ്ടാ,
മിഴിവേറിയ പുഞ്ചിരി മാത്രം ചൊരിയൂ ഹരി കൃഷ്ണാ !

പല നിലയിൽ  വീടും വേണ്ടാ, പുകഴരുളും പണിയും വേണ്ടാ,
കനിവൂറിയ പുഞ്ചിരി മാത്രം ചൊരിയൂ ഹരി കൃഷ്ണാ !

ചന്തത്തിൻ തികവും വേണ്ടാ, ബന്ദ്ധത്തിൻ മികവും വേണ്ടാ,
ബന്ദ്ധുരമാം പുഞ്ചിരി മാത്രം ചൊരിയൂ ഹരി കൃഷ്ണാ !
 
പടയണിയിൽ  പദവികൾ വേണ്ടാ, പുടവകളിൽ കസവുകൾ വേണ്ടാ,
അൻപാർന്നൊരു   പുഞ്ചിരി മാത്രം ചൊരിയൂ ഹരി കൃഷ്ണാ !

പെരിയോരുടെ  താങ്ങും വേണ്ടാ, മണമേറിയ കുറിയും വേണ്ടാ,
കുളിരോലും പുഞ്ചിരി മാത്രം  ചൊരിയൂ ഹരി കൃഷ്ണാ !
 
വഴിയിൽ  പൂവിതളുകൾ വേണ്ടാ, കുടിയിൽ പൊൻ പടവുകൾ വേണ്ടാ,
ദയവാർന്നൊരു പുഞ്ചിരി മാത്രം ചൊരിയൂ ഹരി കൃഷ്ണാ !
 
മദമുണരും  ശയ്യകൾ വേണ്ടാ,  പെരുമ തരും വേദികൾ വേണ്ടാ,  
അഴകിയലും പുഞ്ചിരി മാത്രം  ചൊരിയൂ ഹരി കൃഷ്ണാ !

വീരോചിതശൃംഖല  വേണ്ടാ,  വൈതാളിക ഗാനം വേണ്ടാ,
ചിരിയായെൻ ഉയിരിൽ നിറയൂ, ഭഗവൻ  ഹരി കൃഷ്ണാ !
 

ब्रज कुंजोकी , सुन्दरता अनुपम

वृन्दा सजाके , करे मोहित युगल को

विविध रंगबिरंगी  ,अन्नेक पूष्प

जिसकी सुगंध करे  , लाल को आकर्षित

कुञ्ज मुखरित किया शुक , सारिका और

नाना प्रकार के   सुंदर पंछियो से

जो करे लाल की , ब्रज लीला का गान

आकर बिराजमान   , सजाये कुञ्ज में

देखत देखत  ,मन आती , लूभावे आज

 

एक पंछी बेठा  ,लाल की मुरली समीप

गुनगान करे मुरली के गूणोकी

कोई चरण  समीप देखे पायल को

तो कोई चरण – महिमा बखाने भारी

कोई रहे ब्रज भूमि , जो मधुर रसमयी

 

एक बेठा  ,राधा के बांये केश पर

सुंदर सजे केशो की  महिमा करे

और करे राधा नाम की महिमा  उंच नाद से

जिस नाम से  ,ब्रज महिमा अत्ति मधुर रही

जो गान , लाल कानो में अमरूत समान

आती,  प्रसन्न वृन्दा की सेवा से हुआ

और राखी मुरली , अधर तीरछी अदासे

ध्यान , गान किया राधा नाम का

विजयिराधिका दस , गिनत रहा पंछियो को

 

 

Poem by my loving Vijay dada –

मोहन-लाल शोभे , लाल रंग में
और साथ रही, वृषभानु की लाली ।

दोनों ने धारण कियो , लाल वस्त्र
मद भरे नयन , दोनों के अनुपम। Read the rest of this entry »

अमी ,हलाल , मद भरे , नैन तेरे श्याम
आदमी न जीता है , न मरता है
बस डूब जाता है श्याम
 

Sri Sri Radha Gokulananda

Radhe Radhe ! A sweet contribution from brother Shyamsundar das – 

Kanha doing shingaar for Radhaji

The finished look

ब्रज लिला अनुपम है
जो करे  नित्य लाल  आनदित
लाल ,रस राज, हर लीला को
किशोरी कहे , सजाओ केश मेरे
और बेठी , मोहन चरण समीप  
हाथ लिया , दर्पण देखने सजावट
लाल आसन बनायो , शिला को  
केश में है,  प्राण लाल के बसे
एक एक केश को , कनगन से सजावे
ध्यान राख्यो के,  कछू पीड़ा नहीं होई
करे अपने  को धन्य,  सेवा से आज 
देख रही बावरी बनी , लाल को मुख
भूल गई अपने को  , उनके प्रेम पर
हुई सजावट पूरी , रची एक चोटी
जो रही , लम्बी चरण तक लम्बी
 सजी सुंदर अभूसन ,  जो  एक
तिरछी नज़र से बार बार करे ध्यान लाल
कर बंसी राखी , धयान करे श्रृंगार का
आज वर्षभानु दुलारी पर्शन अति श्रृंगार  पर
श्यामसुन्दरदास    मन रहे सुंदर युगल  छब्बी   
 

Radhe Radhe ! In this poem Vijay dada has described the beauty of Brajdham.

 

ब्रज की सुन्दरता , देखि गिरिराज ललचायो

रह्यो ब्रज में छोड़ी , साथ अग्त्श्य रुषिको  आज
रूप विस्तारी ,खुदको मोहित करे ब्रजजन को
मोहन की नित्य लीला, होय गोप गोपी  संग
घेनु चरावे, लुकाछूपी,  कुन्ड सनान ,  बन भोजन
और दान घटी  करे माखन की लूट गवाल संग
कुसुम सरोवर, फुल्लों की सुगंध से शोभित रहे
रूप और रंग देखि राधा आवे सखिया संग
पूष्प चयन करे, सखिया संग सूर्या पूजा लिए
हाशय परिहशय और गान हुआ अन्नेक
लता हुई ,पुलकित राधा के कर सपरसे
अश्रु धारा बहावी, खिलाई रही अन्नेक पूष्प 
श्याम रंग सुंदर पूष्प, एक दाड़ी पर ऊंचे
कर परसारी ,  कूद रही, बार बार जो मन भाया
पायल  गूंगरू , बज रही ,मधुर मधुर नाद से   
लाल माली वेश रूप धरी ,रखवाली करे यहाँ
राधा कर पकड़ी ,चोरी करते   रोके पूछे परिचय
न कभी देखे ,आप को अन्नेक  सखिया संग
नहीं लेने दूंगा, तनिक एक पूष्प बघियाँ की
शर्माय बोली , हूँ राज कन्या  और तुम माली
दूर रहो , मेरा और तुम्हारे मेल कहाँ और
बेशरम हो कर, पर नरियाँ  का हाथ पकड़ते   
यह ब्रज मेरी ,प्यारी  सखी वृंदा का  और
हमारा  अधिकार पूरा, रहो दूर हम से  माली
हम नित्य उपासक.  सूर्य देव ki और
चयन करके जायेंगे पूजन को देर करायी   
गुस्सा   देखि  भानु दुलारी  का ,लाल हुआ आन्दित 
मोहित हुआ यह रूप से , सखिया हँसी अनेक  
हर  चेष्टा राधा की ,  ही आराधना मोहन की
विजयकृष्ण ,ब्रजरज कृपा से लीला सूनी   
 
 

 

Radhe Radhe – a poem by Vijay dada –

 

नाथ , बसे पश्चिम , और

अरूण , उदय हुआ  पूरब     
किरणे बिखरी , लहरो पर 
स्मूदर पूरा, ज़ग्मग चमका
भुवन पूरा , परकाशित हुआ
मोहन  सुख शैया ,   ताय्जे
रहत तडपत, दर्द से भारी
रानियाँ चिंता  में डूबी
राज वैध नाडी समज न पावे
अन्नेक उपाय व्यर्थ गए
काना का दर्द  दाऊ  न देख सके  
नीर बहा रहे , देख देख लाल छबी
बीमारी न देखि , कान की ब्रज में
पधारे नारद कियो , सब परनाम
रोग  मिटे जो , मिले भक्तन की धूलि
कोई साहस , न कर पाए देने को
लागे भय , दुर्गति से जो दिए धूलि
हार के गए , ब्रज गोपिका के पास 
यमुना का किनारा , ही अति मधुर
जो अन्नेक, कुंजो से शोभित सदा
रत्न  मंडित ,घाट रहे विशाल
मतवाले मोर, नाचत दिन रात
भमर वृन्द ,मंडराई   रहे  कमल पास
जहाँ वसे ,यह ब्रज की गुजरियां
मतवाली ,लाल के विरह में डूबी है
कर रही ,लाल की बाल लीला स्मरण
उदार चित ,की नारियां  मिले यहाँ  
नारद ,धन्य हुए ,उनका दर्शन कर
सूनी  दर्द कथा ,नीर बहा रही  
एक पल न सोची , दी चरण धूलि
बड़ी गठरिया, बांध दिनी हाथ
न राखे ,कोई भय , नरक सवर्ग का
कान का सूख, ही  हमारा संतोष
नारद, गदगद , हुआ अतुल प्रेम देखि
शीश जूकाई, किया कोटि कोटि परनाम
धवारिका   आई  ,दी एक चुटकी धूलि
एक पल में, दूर हुआ लाल का दर्द
ब्रजरज खुशबू , में डूबा लाल मन
हुआ अत्ती हर्षित, और  उठे सैया से  
जगत  देखो, भक्ति की चिर सीमा
भूले पाप पुन्य , करे मेरी   आराधना  
ब्रज प्रेम ,तुलना न हो शकती कभी सपने
रानियाँ हारी , किया परनाम ब्रजबाला को
यमुना की  , एक धारा से पूरा  स्मूदर डूब गया 
ब्रज ki raj   कोटि जगत का आधार  
विजय्क्र्सना   mastak rahe gopipad renu     
 
 
 

जुलत मोहन अकेला

जूलत रह्यो ,  बिचारो अकेला
मुरली अधर राखी , तान बजावे
पूरण रूपसे डूब गया , सुध  बिसराई
आई सब दर्शन करने , को हिलमिल
आरती भोग सामग्री , लाई साथ साथ
देख मूर्त उनकी ,कियो प्रेम से परनाम
हाशय परिहशय , कर रही साथ मिली
कंगन और पायल की , माधुरी नाद
आज ध्यान न,  तोड़ पावे लाल का
सब परेशान , और चली भुवन से बहार 
सोच रही , कैसे आज हुआ ऐसे 
किस रीती से , आब ध्यान खुले अब 
पधारे नारदजी,  देखि कियो परनाम
कृपा करी,  हमे मार्ग दिखावो दर्शन का
अनुमान लगा सकता हूँ , सोच के
लगते  है , मगन ब्रज की लिलाओ में
धयान करते है, गोकुल की रमनता क
ब्रज शोभा आगे रहे,  वैन्कुंथ तुछ अति 
बात  और चली,  लम्बी ब्रज लीला की
सून बात , ऐसी भरा  मन मत्सर से
भूल गए सब,  सूख आनंद जो दिव्य
आये दोडत दोडत ,  भूवन बहार  लाल
देख नारदजी,  कियो परनाम पर्भु
कया सेवा आपकी ,  बताओ रूशिराज
दर्शन  लालसा , और गाता  हु   ब्रज लीला
मधुर मधुर , जो करे आत्मा तरूप्त
बड़े गायनी ,ध्यानी रोते बालक समान
हा नारद ,मेरी  प्रेम साधना में मस्त था
टूटी मेरी साधना ,जब सूनी  ब्रज लीला
मोहित मेरा मन, सून आया आप समीप
पर्भु ने गुनगान  किया , आज ब्रज का  उल्लास से
ब्रज गोपिका का प्रेम , धवारिका रानी न समजे
कहती  हम प्राण , दे सकते है आपको नाथ   
कुर्बानी में हम,  उनसे कम नहीं
तुलना नहीं किस की , समय कराये गायन
नारद रही संग,  सुनाओ  गुणगान मधुर  
कही दोनों , चल बड़े कथा के लिए
सोचे रानियाँ ,   कैसे करे कुश नाथ को
छप्पन  वय्न्जन  बनाये,  लाल समक्ष 
निरखि हुई परशन , खाने लगे नाथ
आज न छोडूंगा , परसादी आप लिए
सून बात ,सत्यभामा  रानी अत्ति परशन
आखिर हमारे नाथ , हम से दूर नहीं
रानी बोली , गोपी ने अईसे भोग बनाये
नाथ कहे नहीं , मिले  रोटी माखन सिर्फ
जो तन और मन , की  मिटावे  भूख मेरी
बड़ा लोभी , अब भी उस   भोग का
हुई सब की , नजरियाँ खेद से नीची 
लाल गंभीर बनके,  सब  को निरखत
धवारीका  भूमि पावन , ब्रज कथा से आज
 विजय्क्र्सना चित्त  रहे  अब गोपीजन कथा में       
 
 
Radhe Radhe
Vijay dada’ s anubhuti of Prem –
प्रेम प्रेम   सब  कहे  
प्रेम  जाने  न  कोई
प्रेम  न  बाड़ी   उपजे  
प्रेम  न  हाट  बिकाय  !
 
प्रेम  समून्दर  है  ब्रज  सीमा  में
जो  आये  डूब  जाये  बिन  मोल
करत  प्रेम एक  दूजे  को  बिना  भेद
dekh yah chabi atti pyar bhari
 

 

ब्रज में चन्द्र अनेक  

गगन खिल्यो है, आज चन्द्र पूरब
रह्यो निर्मल,  गगन में शोभित
चारो और रहे , अन्नेक चमकीले तारे
शोभा रही खूब , आज ब्रज गगन पर
शीतल किरण पसरी, रही चारो और 
यमुना की तरंग में ,जूम रही हलक
कालो जल हुआ शुभ्र, देख  लाल आन्दित
गोकुल लाल , का मुख चन्द्र  समान
जो रहे खुले , गूंगाराले केश के मध्य
पसरी है लटे मोहन की,  खुली चारो और
शीतल पवन उडा रही , जुल्फें लाल की
काले काले केश जैसे , अमावस की रात्रि
सोभा बढ़ा रही , लाल के मुख चन्द्र की
रही सखियाँ चारो और , जो  तारे समान
भान  दुलारी देख रही , पूरब ओर बारबार
ओर शरमाई  रही , नज़रिया कर नीची नीची
लाल कहे किस बात पर,  देखो पूरब को आप 
आप  मुखारविंद , कोटि कोटि  चन्द्र करे लज्जित 
ओर सपरश आप का,  देत अति  शीतल मुजको
सूनी बात लाल की , राधा शरमाई भारी
लाल को  नील कमल, से हलको घात कियो
जो सदा कर राखी,  गूमावत जो प्राण प्यारा
सुंदर लीला छबी , धयान हर्दय करी ब्रज भूमि में
विजय्क्र्सना गोपी चरण ऱज , सदा मस्तक धरे   
 
           
 
 
 
 
 
 

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