Krishna-Karnamritam (excerpts)

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अटरिया पर सुन्दर बगीचा है । उसके बीचोबीच मैं आसन बिछाऊँगी । तुम सखियों के साथ खूशी से उसपर बैठोगी । कब वह दिन आएगा जब तुम्हारे मुख में ताम्बूल अर्पण करूँगी और तुम्हारे चरणों को वक्ष में धरकर संवाहन करूँगी ? श्यामसुंदर को गैया दोहते हुए देखकर तुम्हारे अंग में पुलक होगा । तुम आनंद विभोर हो जाओगी । कब दीन कृष्णदास उस प्रेम को देखकर सुखी होगा ? हे प्राणेश्वरी, जल्दी से मुझे अपने चरणों में स्थान दो । Read the rest of this entry »

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सखियों के आगमन         देखकर हर्षित मन

                धनी उठ बैठे शेज पर,

नयन मेलकर        मूंह धोकर

                सजे दिल भरकर ।

 

धनी हैं गुणवती             सभी कलाओं मे कलावती,

                जानकर श्याम का उद्देश,

मदन-मोहन के मन         को हरने के कारण

                धरतीं हैं निरुपम वेश ।

 

कुंचित केश में वेणी         काले परान्दे की साजनी,

                मृगमद से लिपे अंग,

नील वसन में धनी          ने सजाया तनि,

                नील भुषण से भरे अंग ।

 

हाथ में नील कमल         चलीं करने मनोरथ सफल,

                सारथी है “साहस-राज”,

मन्मथ से धरकर बाज़ी             चली धनी सजी-धजी

                तोड़ दिया कुल-लाज ।

 

घेर लीं सभी जुवती                बीच में बैठीं रसवती,

                हर पल दिल उचाट[1],

तब कवि शेखर              निकला कुंज से बाहर

                और निहारने लगा बाट ।

 

८५

 

 चल न सकई, हुस्न है भर,               

ढारस जुगाये सखियों के कर[2]

 

कामिनी कनकलता नवीना,

त्रिभुवन में नहीं कोई तुलना ।

 

अब राई धनी सत्वर

निभृत निकुंज में बैठीं जाकर ।

 

स्वर्ण चम्पा के कुंज माझ,

वृन्दा ने रचा विविध साज ।

 

विनोद बिछौना, विनोद वन,

देखकर शीतल होवे मन ।

 

फूलों के बीच बैठीं राधिका,

केश में फूल गुंथे विशाखिका ।

 

खिसके वसन, लजाये बाला,

ललिता पहिनाये मोहन-माला ।

 

गाये कोयल मधुर गीत,

द्रवित हो गया धनी का चित्त ।

 

दीवाना इश्क़ से रंगा मन,

चारों तरफ घेर लिये सखियन ।

 

प्राणप्यारे को न देख वन में,

आग धधकने लगी मन  में ।

 

कहे शेखर, “सुनो राई,

नागर न आवे, देखूं जाई ।

 

ओहो ! वे तो घर पर नींद में भोर “

झटपट शेज त्याजे नन्दकिशोर ।

 

जल्दी से निकुंज की ओर करे गमन,

“कहीं रात न बीत जाये”, दिल में धड़कन ।

 

८६

 

जलधर रूप, श्यामल कान्ति,

युवती-मन मोहे, वेश ऐसी भांति[3]

 

“धनी अनुरागिनी”, जानत सुजान[4],

घोर अन्धेरे में किया प्रयाण ।

 

परस्त्री से प्रीत की ऐसी ही रीत,

चले सूने पथ पर, नहीं कोई भीत[5]

 

कुसुमित कानन, कालिन्दी तीर,

वहां चलके आये गोकुल-वीर ।

 

शेखर पथ पर जाकर मिले,

नागर को किया राई के हवाले ।

 

अपरूप राधा-माधव मिलन,

उल्लसित होकर दोनों करें दरशन ।

 

आकूल अमृत सागर में डूब गये,

मधुर-केलि दोनों के, कोई कैसे कहे ?

 

८७

 

दोनों देखें दोनों मुख                सीमा नहीं ऐसो सुख

                पुलकित होवे दोनों तन,

चारों तरफ सखियों का ठाट              लगे जैसे चांद का हाट,

                बीच में सोहे राई-कान ।

 

दोनों के वचन सुनूं                  अमृत से अधिक मानूं

                सखियों के कान होवे शान्त,

देखकर मधुर-मिलन                उल्लसित हुये सखिगण

                फूलों से सजायें राधा-कान्त[6]

 

ललिता के इशारे पर               नर्मदा आयी लेकर

                फूलहार बिन धागे के ;

पहिनाये दोनों के गले              वक्ष के उपर  डोले

                नयन हुए शीतल सभी के ।

 

शेखर मीठी बातें करे,              बोले वचन धीरे धीरे

                बगीचे की शोभा देखने,

सुनकर चतुर कान                  दिल में कुछ लिया ठान

                धनी के हाथ पकड़कर लगे उठने ।

 

८८

 

गलबाहें डालके घूमें दोनों, शोभा लगे न्यारी,

दोनों के रूप से दसों दिशायें होवे उजियारी ।

 

नव-युवतियां चलें दोनों पास,

वन की माधुरी देख हास-परिहास ।

 

जाती, युथी, मल्लिका, मालती, नागेश्वर,

कदम्ब, बकुल, और चम्पक मनोहर ।

 

तमाल-माधवी वन अति गहन-तर[7],

अशोक और किंशुक लगे सुन्दर ।

 

वृन्दावन फल-फूलों से है भर,

माधव-माधवी फिरें स्वजन लेकर ।

 

फूल-वन शोभा दोनों देखें अनुखन[8],

फल-वन देखने को किया गमन ।

 

आम, जाम[9], बिल्व, पिलू, गुवाक, नारियल,

बादाम, छुहारा, लिम्बू, कपित्थ सकल[10]

 

कंवला, पियाला और पनस, खजूर,

अंगूर, अनार, अननस सुमधुर ।

 

ताल, बेर, केले के जितने कानन,

प्रफुल्लित होकर दोनों करें भ्रमण ।

 

यन्त्रशाला में आये नागरी-नागर,

इस वक़्त विविध यन्त्र लाया शेखर ।

 

 

 

 

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भ्रमत गहन वन में जुगल-किशोर,

संग सखीगण आनन्द-विभोर ।

 

एक सखी कहे, “देखो देखो सखियन,

कैसे एक दूजे को देखें, अपलक अंखियन !’’

 

पेड़ हैं पुलकित, खुशबू[1] पाकर भ्रमर-गण

उनकी ओर[2] भागे त्यज फूलों का वन ।

 

दोनों बैठे थे माधवी कुंज,

राई मुख-कमल पे गिरे अलि-पुंज[3]

 

लीला-कमल से कानू लगे उन्हें मारने,

‘’मधुसूदन[4], जाओ !’’ लगे वे बोलने ।

 

यह सुन राई हुई विरह -दीवानी,

कहे राधा-मोहन, ‘’कैसी अनुरागिनी !”

 

राई की ऐसी दशा देख दुखी हुये नागर,

राई को लिये गोदी में नज़दीक आकर ।

 

बहुत जतन से उन्होंने चेतन कराया,

मधुर वचनों से उन्हें ढारस बंधाया ।

 

 “ सुन्दरी, कहो यह विड़म्बना ?

निरुपम प्रेम में क्युं यह वेदना ?

 

प्रेम है अमृत रस, माधुरी अपार,

फिर भी यह दुख ! शंका हमार ।

 

हम तुम्हारे सामने बैठकर, कर रहे आस,

 फिर भी हमें दूर सोचकर कर रही निराश !

 

कितना विलाप कर रही हो तुम !

भयंकर विरह में मूझे कर रही हो गुम !”

 

यह सुनकर राधा गोरी,

लाज से हो गयी भोरी  ।

 

देखकर राधामोहन हुआ आनन्द-मगन,

श्याम ने लिया गोदी में[5] होकर प्रसन्न ।

 

 

राधा-माधव की जोड़ी लगे अतुलन,

देखकर दिल होवे आनन्द-मगन ।

 

वृन्दा-रचित विपिन में करें विलास,

दरशन को सखियां लगाये आस ।

 

ललितानन्दद कुंज में दोनों बैठे जाकर,

सखियां आकर बैठ गयीं उन्हें घेरकर ।

 

वहां से फिर गये मदन-सुखदा में,

सखी संग मिलकर विहरे  सुख में ।

 

फिर चित्रा-सुखद, वहां से चम्पकलता-कुंज,

सुदेवी, रंगदेवी के कुंज में हुआ आनन्द का पुंज[6]

 

फिर इन्दु-सुखद कुंज में कितनी मस्ती हुई,

तुंगविद्या के कुंज में फिर सखियां लेकर गयीं ।

 

घूमे सभी कुंज में और देखे छः ऋतुओं की शोभा,

उद्धव गाये रसगीत, “ कुसुम-सुषमा है मनलोभा” ।



[1] युगल सरकार की खुशबू

[2] युगल सरकार की ओर

[3] मधुमक्खियों का झूंड

[4] मधुमक्खी

[5] श्यामसुन्दर ने राधाजी को गोदी में लिया

[6] ढेर सारा आनन्

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दोनों के चेहरे देखकर दोनों को हुआ धन्द[1],

राई कहे तमाल, तो माधव कहे चन्द । Read the rest of this entry »

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अपरूप कुंड की शोभा             राई-कानू मनोलोभा

                चारों तरफ शोभे चार घाट

विविध रत्नों की छटा              अपूर्व सीढ़ियों की घटा

                स्फटिक मणियों से बना घाट । Read the rest of this entry »

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मेरे तो तीन प्रभु हैं – निताईचांद, गौरसुंदर और सीतानाथ । मेरी प्रार्थना है कि वे मुझपर कृपा करके अपनी लीला माधुरी का दर्शन कराएं । और सिर्फ इतना हि नहीं, मुझे हमेशा अपने संग रखें । Read the rest of this entry »

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kk-cover-004Dear sweet devotees,

Radhe Radhe.

We are very happy to announce that Sri Krishna-Karnamritam has revealed Himself in the form of a book. The book contains very sweet commentary by Sri Srimad Ananta das Babaji Maharaj, the Mahant and Pandit of Sri Radhakund. His commentary is a compilation of three commentaries – by Srila Gopal Bhatta Goswami, Srila Krishna das Kaviraj Goswami and Srila Chaitanya das Goswami. This is the first time in history that Sri Krishna Karnamritam is revealing Himself with all the three Goudiya Vaishnav commentaries. Such priceless treasure is not available elsewhere.

The text is of approximately 650 pages, A4 size, hard-bound multi-colored cover. The offer is for :

37 USD or 26.5 Euro for outside India (PLUS transaction fees). This includes the charge of registered post via airmail – speed post. You can pay either through “paypal” or “moneygram“.

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For any further query please contact madhumatidasi(at)gmail.com.

Radhe Radhe.

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Verse 112

anugraha-dwiguna-vishâla-lochanair-

anusmaran-mridu-murali-rava-amritayih,

yato yatah prasrati me vilochanan

tatas-tatah sphuratu tavaiva vaibhavam.112.

 

Translation

 

Wherever I may cast my gaze with my mind absorbed in Your sweetness, please show Your compassion and manifest Yourself with Your extremely large eyes and soft notes of the flute in those very same places.112.

 

Âswâd-bindu purport

 

S

rila Krishnadâs Kavirâj Goswâmi says: Sri Krishna said with a voice brimming in love, “O Lilâshuk, you speak the truth Read the rest of this entry »

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Verse 111

dhanyânân sarasânula-apasarani sourabhyâm-abhysyatâng

karnânâm vivareshu kâmapi sudhâ-vridhtin duhânam muhuh,

vanyânân-sudrishâm mano-nayanar-magnasya devasya nah

karnânâm vachasâm vijrimbhitam-aho krishnasya karnâmritam.111.

 

Translation

 

Aho! Sri Krishna-Karnâmritam is the love-text that pleasures the ears and the tongue of our Lord, from Whom the beautiful doe-eyed Gopis never shift their gaze. It relentlessly showers nectar in the auditory canals of the glorious and blessed devotees. May they relish this masterpiece while delighting in Krishna-kathâ ! 111.

 

Âswâd-bindu purport

 

S

rila Krishnadâs Kavirâj Goswâmi says: Sri Krishna told the poet with a voice brimming in love, “O Lilâshuk, your text Sri Krishna-Karnâmritam will naturally be nectarine to me, my beloveds and to my rasik and vidagdha devotees. Read the rest of this entry »

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Verse 110

ishâna-deva-charana-âbharanena neebi-

dâmodara-sthira-yasha-stavakod-bhavena,

lilâshukena rachitan tava krishna-deva

karnâmritam vahatu kalpa-shatântare’pi.110.

Translation


 

O Krishna-dev! Ishândev’s[1] lotus feet are Lilâshuk’s ornament. Neebi-Dâmodar’s never-fading bouquet of glory is his treasure. May that Lilâshuk’s composition Sri Sri Krishna-Karnâmritam submerge the devotees for hundreds of kalpas. 110.


 

Âswâd-bindu purport

 

S

rila Krishnadâs Kavirâj Goswâmi says: Sri Krishna was overjoyed. He said, “O Lilâshuk, your sweet and brilliant speech is showering Amritam in my ears. I am extremely delighted. Please seek some boon.”

Sri Krishna is sweetness personified. His beauty, qualities and leelâs are all overflowing with sweetness. Sri Krishna-mâdhurya is so delicious that it attracts not only the devotees, but it arouses a strong desire in Sri Krishna Himself to relish it—

 

“It is the natural property of Sri Krishna’s sweetness to agitate men, women and even Sri Krishna Himself. It attracts the ears, eyes, mind and all other faculties. Sri Krishna Himself strives to relish His Own sweetness.” Read the rest of this entry »

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