Sri Sri Pada-Kalpa-Taru

It is a collection of rasfull songs describing the Name, excellence, beauty and pastimes of Sri Gouranga Mahaprabhu, Srimati Radharani and Shyamasundar.

ओ लाली मेरी            प्यारी दुलारी

        कहकर जसोदा सजाये,

चमकीले लट               काले घन-घट,

        संवारकर वेणी बनाये ।

 

कितने दिनों की आस             आज बुझाये मैया प्यास

               हाथों से राधा को सजाये,

पहिनाये नवीन वसन            और कीमती भुषण,

               प्यारी को पुचकारती जाये ।

 

ऐसो मांग का सिन्दूर             कि उदित सूरज के गुरूर        

तोड़कर करे चूर चूर ।           

तिलक पे अलक[1]                  ललाट पे झलक

               पलक में ध्यान करे दूर[2]

 

जोगी-मुनि-जन                   के मोहित करे मन

               जब लट बलखाये,

तपस्वियों की क्या बात          कामदेव को दे मात

               उनके नख की छटाएँ ।  

 

नयन युगल         में सजाया काजल,

               पोंछा सुन्दर मुख,

भौंहों की रंगीली          भंगिम छबीली,

               मन्मथ को दें दुख ।

 

नासा के उपर              सुन्दर बेसर

               साँसों के संग डोले,

पुरुष-रतन                  को कर दे ख़तम

               उन की जान से खेले ।

 

कान के कान-फूल         हैं अमोल-अतुल

               जिसकी छटा रवि को घटाये,

दीवाना परवाना          हुआ अनंग मस्ताना[3]

               चरणों में लोट्पोट खाये ।

 

चन्दन-चर्चित              परम पुनीत

               पीन-पयोधर[4] जोड़

कञ्चुकी कसकर           उनको ढंक कर

               खींच दिया डोर ।

 

प्रवाल प्रबल[5]              आलोकित झलमल[6]

               बीच में काली मोती,

हेम हीरे मणि              इसपे है बूनी

               कञ्चुकी बिखेरे ज्योति ।

 

माँ यशोमती                              है प्यार की मूर्ति

               राई को लिया गोद में,

ये सब भुषण                              करके जतन

               पहिनाया उनके गले में ।

 

हृदय पे हीर-हार                 लागे अति मनोहर

               उसपे पदक[7] का साज,

देख कर दिनकर[8]          किरणों को समेटकर

               घर लौटे वह निलाज[9]

 

राम[10] काम शाला[11]             शंख शशिकला[12]

               शोभे बाहों पर ।

रतन कंगन                         बजे कनकन झनकन

               देखे काम चमककर ।

 

गाढ़े तार का साज                जैसे गति कामराज

               बाहों में पहिनाये,

उंगलियों पर अंगूठी              हैं ऐसी अनूठी

               काम का गुरूर कुचलाये ।

 

मेघ के गर्व                         को करे खर्व

सुन्दर नीला वास,

किंकिणी की आवाज़             जैसे मधुर साज़

बोले नट्खट भाष ।

 

मंजीर पैंजन                करके जतन

               पग में पहिनाये शेखर,

जसोदा-रोहिनी                   उल्लसित अपनी

               धनी को हसीन सजाकर  ।




[1] ज़ुल्फ

[2] राधाजी के ललाट पे जो तिलक या बिन्दी है, उसपे ज़ुल्फ गिर रहा है, इससे उनकी खूबसूरती और बढ़ रही है ; इसे कोई योगीन्द्र भी देखे, तो पलक झपकते ही उसका ध्यान टूट जायेगा ।

[3] अनंग अर्थात कामदेव (यहाँ पर श्यामसुन्दर) जिनका अन्दाज़ मस्ताना है, राधाजी के दीवाने हो जाते हैं ।

[4] स्तन

[5] गहरे लाल रंग के प्रवाल

[6] यह कञ्चुकी वर्णना है ।

[7] लॉकेट

[8] सूरज

[9] बेशर्म  की तरह लौट आया ।

[10] रामिणी ; रमण करनेवाली ;  यहाँ पर  राधाजी ।

[11] काम-कला का आलय

[12] बाहों पर अलंकार पहनी हुयीं हैं; यह अलंकार चन्द्रकला के आकार के शंखों से बना हुआ है ।

 

 

आवत रे मधुमंगल की टोली,

देख सखागण बजाये ताली ।

 

चलते ही चरण पड़े तीन बंक[1],

पग कलंकित कालिन्दी-पंक[2]

 

बोलते ही मुख पर करे कितने भंग[3],

नाचे ज़ोर से और बजावत अंग ।

 

भोजन-सर्वस्व, नहीं प्रतिबन्ध[4],

हर रोज़ सुबह लगाये द्वन्द्व[5]

 

मिष्ठान पक्वान लोभी बावला-चित्त,

इनके लिये गिरवी रखे यज्ञोपवीत[6]

 

कभी न देखा ऐसा छलिया,

प्यार से देवे दस गालियां ।

 

गोविन्द दास करे गुन-गान,

द्विज-पग पे लाख प्रणाम[7]


[1] मधुमंगल आगे बढ़ने के लिये हमेशा तीन पग लेता है, और वे तीन पग बंक अर्थात टेढ़े होते हैं ।

[2] मधुमंगल के पैर कालिन्दी के पंक अर्थात मिट्टी से मैले (कलंकित) होते हैं ।

[3] भंगिमा

[4] मधुमंगल के लिये भोजन ही सब कुछ है; उसके मुताबिक खाने पीने के मामले में कोई नियम लागू नहीं हो्ना चाहिये ।

[5] हर सुबह भोजन करते वक़्त वह दोस्तों को चुनौती देता है – कि कौन कितना ज़्यादा भोजन कर सकता है ।

[6] मधुमंगल मीठा और पक्वान्न के लिये अपने यज्ञोपवीत, जो एक ब्राह्मण के लिये अत्यज्य है, उसे भी गिरवी रख सकता है ।

[7] सन्त कवि गोविन्द दास श्यामसुन्दर से ऐसे निष्कपट प्रेम करने वाले ब्राह्मण को लाखों बार प्रणाम करते हैं ।

 

राग मायुर

 

कमल-कुसुम सुकोमल कान्ति,

सर पे मोर-पंख की पंक्ति ।

 

आकूल अलि[1]-कुल बकुल की माला,

चन्दन चांद-चर्चित भाला[2]

 

मदन मोहन मूर्ति कान्ह[3],

देख उन्माद हुये युवती-प्राण ।

 

भौं-विभंगिम[4] दे हिचकोले,

उन्नत नासा पे मुक्ता डोले ।

 

बंकिम ग्रीवा, मीठा बोले,

कंचन-कुंडल गाल पे डोले ।

 

मणिमय आभूषण अंग पे विराजे,

पीत निचोल[5] उस पर सजे ।

 

अरुण-चरण पे मणि-मंजीर सोहे,

गोविन्द दास को और[6] न भाये ।

 


[1]भ्रमर ; भ्रमर आकुल होकर बकुल की माला पर मंडरा रहे हैं ।

[2]भाल

[3]कान्हा

[4]भौंहों को अच्छी तरह से नचाना – उन्हें देखकर गोपियों कें दिल हिचकोले खाते हैं ।

[5]धोती

[6]कोई और

राग सिन्धुड़ा

 

अंजन-गंजन[1]       जग-जन-रंजन[2]

जलद-पुंज जैसे वर्ण,

तरुण-अरुण-स्थल-       कमल-दल-अरुण[3]

मंजीर-रंजित-चरण ।

 

देखो सखी नागर-राज करे विराज,

सुधा-रस टपके,      हास विकसित,

रूप ऐसा कि चांद को आये लाज ।

 

इन्दीवर-वर-        गर्व-विमोचन[4],

लोचन मन्मथ-फन्दा,

भौं-भुजग-पाश[5] से        बंध लिया कुलवती,

मनमोहन चेहरा-चन्दा ।

 

भ्रमर भटके        जानू तक लटके,

केलि-कदम्ब की माला[6],

गोविन्द-दास-चित्त       विहारे नित नित,

ऐसी मूर्ति रसाला ।

 




[1] यहां पर अंजन का अर्थ काजल नहीं है, बल्कि अंजन एक उज्वल रसायन है; श्यामसुन्दर का वर्ण अंजन से भी उजला है ।

[2] वे त्रिजगत के लोगों को आनन्द प्रदान करते हैं ।

[3] तरुण अर्थात ताज़े गुलाबी स्थलकमल के समान गुलाबी चरण जो मंजीर (नुपूर) से शोभित हैं ।

[4] इन्दीवर-वर (श्रेष्ठ नील कमल) का गर्व अच्छे से तोड़े ऐसे नयन, जो कामदेव के फन्दा है ।

[5] उनके भौंहें, भुजग (सांप) जैसे हैं, और वे इनको रज्जु की तरह इस्तेमाल करके कुलवती रमणियों को फांसते हैं ।

[6] कदम्ब की माला, केलि, अर्थात रति-रस के लिये आतुर करती है । उसके इर्द गिर्द भ्रमर घूमते हैं, और वह जानू तक लटकती है ।

३५

जन्म से मैंने,       गौर-गर्व में बिताया,

फिर कैसे जिऊं इतना दुख सहकर ?

उर बिना सेज का,       स्पर्श ना जानूं[1],

सो तन अब लोटे ज़मीन पर ।

 

वदन-मण्डल,       चांद झिलमिल,

सो अति सुन्दर चेहरा,

लगता है ऐसे,      राहू के डर से,

चांद है भूमि पे गिरा ।

 

पद-उंगली से ,      ज़मीन पर लिखूं,

हो गई मैं पागल,

श्रावन की वर्षा जैसे,      निर्झर झरे,

दिल हुआ विकल[2]

 

कभी तो मुख से,        फेन निकले,

घन घन बहे निःश्वास,

गौर हरि से मैं,     पुनः मिलाऊंगा,

निश्चय किया माधव दास[3]




[1]हमारे प्रभु सारी रात प्रिया जी को अपने उर, अर्थात वक्ष पर सुलाते थे, और प्रियाजी के अंग को पलंग से स्पर्श ही नहीं होने देते ।

[2]व्याकुल

[3]सन्त माधवदास ने निश्चय किया कि वे प्रियाजी को गौर हरि से ज़रूर मिलायेंगे ।

३४

(प्रियाजी कहती हैं)

गौर-गर्व[1] में हाय,        जीवन बिताया,

अब वे हुये निर्मम[2],

अपनों के वचन,     गरल सम लागे,

गृह हुआ अग्नि सम[3]

 

याद कर उनका मुख,     दिल फटा जाये,

शूल चूभे वक्ष में,

गौरांग बिना,       दिवस ने बीते,

नींद न आये रात में ।

 

चैन न पाऊं,        ज़मीन पर लोटूं,

पवन-अनल[4] जलाये अंग,

सखि ! क्या करूं,        किससे भेजूं सम्वाद,

क्या, मिलेगा उनका संग ?

 

व्यथित जन[5],       समझाये अनुक्षण,

“धीरज धरो दिल में,”

सतत यही गुण[6],        करूं अवलम्बन,

वज्र गिरे माधव के सर पे[7]




[1] गौरांग मेरे हैं, इस गर्व में जीवन बिताया ।

[2] निष्ठुर

[3] अपनों के मीठे बोल, अर्थात गौर-विषयी प्रसंग या तो उनके द्वारा की गयी कोई बात, जो गौर की याद दिलाये, विष जैसे प्रानघाती लग रहे हैं । गृह भी अग्नि समान लग रहा है, क्युं कि वहां भी सर्वत्र गौर की यादें हैं ।

[4] शीतल पवन और ज़्यादा रति उद्रेक करता है ।

[5] सभी नबद्वीपवासी गौर विरह में व्यथित हैं, और प्रियाजी को समझाने का प्रयास कर रहे हैं ।

[6] यही गुण = प्रियाजी कह रही हैं कि वे धीरज / संयम सतत ही रखने की कोशिश कर रही हैं ।

[7] सन्त कवि माधव दास प्रार्थना करते हैं कि प्रियाजी की ऐसी हालत देखने से तो अच्छा है कि वज्र के आघात से मर जायें ।

३३

ठाकुर लोचन दास ने “श्री चैतन्य मंगल” में श्री गौर-गोविन्द की नित्य-लीला का सम्भोग लीलारंग इस तरह से वर्णन किया है –

 

शयन मन्दिर में सो रहे हैं नागर,

विष्णूप्रिया गयीं ताम्बूल थाली लेकर ।

 

“आओ आओ” प्रभु ने कहा हंसकर,

बहुत प्यार करे गोद में उठाकर ।

 

विष्णुप्रिया ने प्रभु-अंग पे चन्दन लगाया,

अगुरु कस्तूरी गन्ध से तिलक रचाया ।

 

दिव्य मालती-माला से सजाया गौर-अंग,

श्रीमुख में ताम्बूल दिया करके नाना रंग[1]

 

फिर महाप्रभु, वे तो रसिक-शिरोमणि,

विष्णुप्रिया को सजाये नागर चुड़ामणि ।

 

दीर्घ केश, काम की चंवर जैसे उज्ज्वल,

जूड़ा बांधकर दिया मालती के माल ।

 

चन्द्रकला ने जैसे मेघ को बांध लिया है,

उगल रही या निगल, समझ न सकूं मैं ।

 

सुन्दर ललाट पे रचा सिन्दूर बिन्दु,

दिवाकर की गोद में खेल रही इन्दु ।

 

रचा चन्दन बिन्दु, सिन्दूर के चारों ओर,

सूरज देखने को जैसे चांद आये हैं दौड़कर ।

 

खंजन नयन मे दिया उज्ज्वल अंजन,

भौंहों को बनाया काम का कमान ।

 

अगुरु कस्तूरी किया कुच पर लेपन,

उसपर दिया दिव्य कंचुकी-आवरण ।

 

फिर अंग पे सजाया विविध अलंकार,

ताम्बूल हंसी से नागर खुश हुये अपार ।

 

त्रैलोक्य-मोहिनी रूप निहार रहे वदन,

खुशामदी करके ले अधरों का चुम्बन ।

 

क्षण में भुजलता[2] से किया आलिंगन ऐसे,

गजेन्द्र ने कमलिनी को गोद में उठाया जैसे ।

 

विविध रस बिखेरे विनोद-नागर,

औरों की क्या बात, काम का भी अगोचर[3]

 

सुमेरु की गोद में बिजली का प्रकाश[4],

मदन मोहित देखकर यह रति-विलास ।

 

हृदय पर धरे, न छूने दें शय्या से,

करवट न बदले, दोनों लिपटे एक दूसरे से ।

 

दिल पे दिल, मुख पे मुख, रजनी बिताये,

रस-क्लान्ति में चूर, दोनों सुख-निद्रा जाये ।




[1] हंसी मज़ाक

[2] प्रियाजी ने प्रभु को लता जैसी भुजाओं से आलिंगन किया, तो  प्रभु ने उन्हें उठा लिया । ऐसा लगा मानो कोई शक्तिशाली हाथी ने कमल की कलि को गोद में उठा लिया हो ।

[3] कामदेव भी नहीं जानते हैं, प्रभु ऐसी प्रेम-कला का विस्तार करते हैं ।

 

[4] सुमेरु पर्वत सोने से बना है । हमारे प्रभु भी स्वर्ण वर्ण के हैं । इसलिये जब वे प्रियाजी के साथ केलि कर रहे हों, तब ऐसा लगता है, जैसे सुमेरु पर्वत से बिजली टकड़ा रही हो ।

२०

तथा राग

 

राधारानी को शरमाते देखकर चम्पकलता का दिल भर आया, और वह जमकर उनकी तरफदारी करने लगी । उसने कन्हैयाजु को डांट दिया ।

 

कान्हा, यह तेरी कैसी है रीत ?

तेरी बातों में आकर प्यारी बेच दिया तन,

अब तू कहता है विपरीत !

 

पति से मिलाने का बहाना बनाकर,

बगीचे में प्यारी को लाया,

नलिनी-सुकोमल दुलारी-सुनागरी,

अकेली पाकर सताया !

 

( ललिता से -)

धनी सती-शिरोमणी, नव-कुल-कामिनी,

पर-पति सपने में न जाने,

यह नव-यौवन, अमूल्य रत्न-धन,

दूसरे के हाथ में सौंपा तूने ?[1]

 

( फिर श्यामसुन्दर से – )

 

तेरे रस में रसवती,छोड़ निजपति,

न करे भय गुरुजन से !

चम्पक लता की वाणी इतनी मधुर

बलराम-दिल सींचे अमृत से ।

 




[1]चम्पकलता यह वाक्य ललिता सखी से कह रही है, क्युंकि ललिता सखी ने पहले कहा था कि उसने श्याम को सज्जन जान कर राई का हाथ उसके हाथ में सौंपा था ।

१९

तथा राग

प्राणप्यारी राधारानी के प्रति श्यामसुन्दर की कपटता भरी शिकायतें सुनकर चित्रा सखी को बड़ा मज़ा आया । उसने कन्हैया जी की बातों पर अपनी तरफ से व्यंग्य-रस का रंग चढ़ाया । उसने कहा – “हां, हां, सच ही तो है ! सखी ! यह तूने क्या कर दिया ! तूने अपने कठोर देह से इतने कोमल श्याम-अंग को इस तरह की हा्नि पहुंचायी !!”

 

दलित-नलिन-सम[1] मलिन वदन-छवि[2]

होंठ किये खण्ड-विखण्ड[3],

मिटा दिया उज्वल चन्दन-काजल,

पीस डाला मरकत-गण्ड[4]

 

शिरीष-कुसुम सम श्याम-अंग,

 और अति कठोर तेरा तन,

 ऐ सखी ! पर्वत समान कुच से,

तूने किया हृदय-चक्र मर्दन !

 

नील-कमल सम कोमल वक्ष-स्थल,

फाड़ा नख-शर से, पहुंचायी हानि,

व्यथा के मारे मूंद ली लोचन,

फिर भी बोले प्रेम की बानी[5] !

 

मन्मथ-भूपती-भय[6] नहीं तूझे,

सखियों का सम्मान किया चूर !

चित्रा-वचन सुन धनी लजाए,

देख बलराम हुआ सुख-विभोर ।




[1] पीसा हुआ कमल के जैसा

[2] श्याम का चेहरा बिल्कुल पीसा हुआ कमल की तस्वीर जैसा लग रहा था ।

[3] चित्रा का कहना था – किशोरी जु ने उनके होंठ के टुकड़े टुकड़े कर दिये थे ।

[4] पन्ना के समान चमकने वाले गाल

[5] अहा ! श्यामसुन्दर तुझसे इतना प्यार करते हैं कि, तूने इतनी व्यथा पहुंचायी, फिर भी वे प्रेम जता रहे हैं ।

[6] क्या तूझे महाराज कामदेव का डर नहीं ? तात्पर्य है, कि, जो तुझसे इतना प्रेम करता हो, उसे इस तरह सताने से, प्रेम का राजा क्रोधित हो जायेंगे ।

१८

तथा राग

ललिता ने इतनी बड़ी तोहमत लगाई है कि किसी भी सज्जन के लिये चुप रहना नामुमकिन है । कन्हैया जी इसका करारा जवाब देते हैं । वे कहते हैं – मैं बिल्कुल निर्दोष हूं ! ललिते, क्या तुम जानती हो तुम्हारी इस तथा कथित भोली भाली सखी ने मेरे साथ क्या सुलूक किया है ? तो सुनो………

 

पहले तो अधर में है लाली लगाती,

जिससे मदन-शर[1] छोड़ जर्जर[2] करती ।

 

नख में है इतनी शक्ति,

वक्ष फाड़ दिल को मरोड़ती ।

 

कंगन हैं या खड्ग कटीले,

उस पर अधर-स्पर्श ज़हरीले ।

 

पूरे तन को घायल किया,

जबरदस्ती मुझ को लिया ।

 

सुन सहचरी, तेरी सखी नहीं भोली,

मुझे फंसा कर देती है गाली !

 

रस-औषध देकर मुझे है तपाती,

बाद में मुझे ही बदनाम करती !

 

भुज-बन्धन[3] से किया दिल को पीड़न

कुच-पर्वत[4] से फिर किया मर्दन[5]

 

अरे, इसकी रति अति दुर्भर[6],

घायल किया सारा कलेवर ।

 

मैं ही जानूं रजनी कैसे बिताई,

अब सुबह को थोड़ी नींद आई ।

 

मुझे मूर्छित देख कर भी न आयी दया,

उस कठोर-हृदय ने जाने न दिया ।

 

सरल मुझे पाकर, की जोरा जोरी,

मन्मथ-अभिलाषा[7] की है पूरी ।

 

ऐसा कह कर राधा-वल्लभ,

चेहरे पर रखाकर-पल्लव[8]

 

ऐसी मधुर-वाणी पे बलराम,

निछावर करे अपने पराण[9]




[1]कामदेव का शर

[2]झकझोर देना

[3]बाहों के बन्धन

[4]पर्वत जैसे स्तन

[5]बुरी तरह से मारना

[6]कन्हैया जी कहते हैं कि किशोरीजु की रति-उत्तेजना बड़ा् बडी ही कष्टदायक है ।

[7]रति-केलि की इच्छा

[8]श्याम सुन्दर ने कमल जैसे हाथों से अपने चेहरे को ढंक लिया ।

[9]प्राण

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